जयपुर की गलियों से मुंबई तक का सफर तय कर ऐसे पाई थी खास पहचान: इरफान खान

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इरफान खान किसी परिचय के मोहताज नहीं रहे है उनकी असमय हुई मौत ने उनके बारे में लिखने को मजबूर कर दिया है। आज इरफान इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, लेकिन थियेटर, टेलीविजन और सिनेमा बॉलीवुड से हॉलीवुड तक का यह चमकता सितारा यूं ही नहीं खास है। आज जिस मुकाम पर इरफान खान थे वो उसे पाना आसान नहीं है। बहुत संघर्षों के बाद उन्होंने सितारों की भीड़ में ही अपनी खास जगमगाहट से अलग पहचान बनाई।

बचपन की बात और फिर शुरू हुआ एक्टिंग का सफर
इरफान का जन्म जयपुर के एक कारोबारी पठान परिवार में हुआ था। मूलरूप से उन्का परिवार जयपुर से 70-100 किमी दूर टोंक के पास एक गांव का रहने वाला है। इरफान की शुरुआती पढ़ाई जयपुर में ही हुई। उन्होंने बताया था कि कुछ वक्त तो पढ़ने में मन लगा। बाद में सारा ध्यान अभिनय की तरफ हो गया।’ उनके साथी और रिश्तेदार बताते हैं कि वे बचपन से काफी शर्मीले थे। लेकिन बगावती फितरत उनके अंदर हमेशा रही। इरफान की शुरुआती पढ़ाई जयपुर में ही हुई।

उन्होंने बताया था कि कुछ वक्त तो पढ़ने में मन लगा। बाद में सारा ध्यान अभिनय की तरफ हो गया।’ उनके साथी और रिश्तेदार बताते हैं कि वे बचपन से काफी शर्मीले थे। लेकिन बगावती फितरत उनके अंदर हमेशा रही। जयपुर में नाटक की बारीकियां सीखने के पहले इरफान जब मामा के साथ जोधपुर एक थिएटर देखने गए तो उसी समय से उनपर अभिनय का भूत सवार हो गया । बाद इरफान जयपुर से एक्टिंग की बारीकी सीखने के लिए दिल्ली चले गए। दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में एक्टिंग को निखारा। इसके बाद यहां से वे मुंबई चले गए।

एक साक्षात्कार में इरफान ने बताया था, कि वे एक दिन जयपुर के रवींद्र मंच के ऑफिस में पहुंच गये और वहां मौजूद लोगों से कहा कि वे नाटक करना चाहता हैं। जवाब में उन्होंने कहा कि ये तो ऑफिस है। यहां नाटक नहीं होते। आप नाटक मंडली से मिलिए। फिर उनकी नाटक मंडली से संपर्क किया। यहीं से उनका अभिनय का सफर शुरू हो गया।’ उन्होंने बताया कि उन्होंने पहला नाटक ‘जलते बदन’ किया था।

मीरा नायर की पहली पसंद फिर भी कट गया रोल

जहां से कई महान फनकारों ने अपनी जगह मायानगरी में बनाई, उसी एनएसडी से पास होने के बाद एक मिनट से भी कम समय के लिए मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे में स्क्रीन पर दिखे, बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि पहले लीड रोल के लिए इरफान मीरा नायर की पहली पसंद थे। लेकिन इसे किस्मत की बात कहे कि उस किरदार की उम्र कम होने के चलते, इरफान के हिस्से से वह रोल कट गया था। जयपुर में उनके साथ बिताये थियेटर के दिनों को याद करते हुए जफर बताते थे कि रंगमंच के दिनों में उनकी अदाकारी लोगों को बेहद पसंद आती थी।

संघर्ष का आलम ऐसा था

जीवन में उतार को बेहद करीब से देखने वाले इरफान ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए एक बार बताया भी था कि किसी धारावाहिक में काम के लिए एक सीन में एक बड़े कलाकार द्वारा उनकी बेइज्जती की गयी थी और उनके हिस्से के पैसे भी काट लिये गये थे। संघर्ष का आलम ऐसा था कि उनकी कई ऐसी फिल्में भी थी जिनमें बेहद उम्दा प्रदर्शन करने के बावजूद , लोगों की नजर में वे कम ही आये थे। एक डॉक्टर की मौत, जिसमें वह पहली बार पंकज कपूर के साथ पर्दे पर दिखे, एक पत्रकार की भूमिका में। तपन सिन्हा की इस फिल्म में उनकी छोटी लेकिन सशक्त भूमिका रही।

फिल्मों में मुकाम पाने वाले इरफान का संघर्ष काफी बड़ा ही रहा। टेलीविजन में चंद्रकांता धारावाहिक से पहले उन्होंने श्रीकांत, भारत एक खोज, कहकंशा, चाणक्य, द ग्रेट मराठा, बनेगी अपनी बात, जस्ट मोहब्बत, जय हनुमान आदि कई धारावाहिक में काम किया है तो क्या कहें, मानो या न मानो जैसे कई कार्यक्रमों को होस्ट किया।

एफटीआईआई में नहीं दिखाई अपनी फिल्म

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी फिल्म द वॉरियर से कामयाबी की पहली सीढ़ी माना जा सकता है। ब्रिटिश निर्देशक आसिफ कपाड़िया के निर्देशन में बनी इस फिल्म को देश-विदेश में सराहा गया था। उसी दौर में उभरते हुए कई निर्देशकों के साथ इरफान जुड़ते चले गये। बाईपास शार्ट फिल्म का निर्देशन करने वाले अमित कुमार जो कि आसिफ कपाड़िया के मित्र भी हैं और उनके साथ द वारियर फिल्म में भी सहायक थे। बाईपास में भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की कहानी लोगों को काफी पसंद आयी थी। बाईपास फिल्म भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराही गयी है।

2001 के बाद इरफान की प्रमुख फिल्मों में हासिल, मकबूल जैसी बड़ी फिल्में रही। ऐसी फिल्में जिन्होंने निर्देशक के रूप में तिग्मांशु धुलिया और विशाल भारद्वाज दोनों को ही भारतीय फिल्म उद्योग में स्थापित कर दिया। तिग्मांशु तो अपने कई साक्षात्कारों में कह चुके हैं कि उन्होंने आज तक इरफान जैसा अदाकार नहीं देखा जोकि आंखों के माध्यम से अभिनय कर देता था।
जीवन के मर्म के बखूबी से समझ चुके इरफान, अहंकार को इतना पीछे छोड़ चुके थे कि जब फिल्म एवं टेलीविजन इस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में वह जब छात्रों के बीच पहुंचे तो उन्होंने अपनी फिल्म दिखाने की बजाय उन्होंने हॉलीवुड की द मास्टर फिल्म दिखायी जिसे उन्होंने एक कमाल का काम बताया था।

साथ पढ़ें दोस्त की जुबानी…

आलोक चटर्जी और इरफान खान 1984 से 1987 तक नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में साथ पढाई किये थे। उन्होंने फोन पर बात क्रम में बताया कि शुरू से ही वे गंभीर अभिनेता थे, कम बोलते थे, हंसाने में माहिर थे। एनएसडी में इंटरव्यू के दौरान इरफान ने कहा था कि एफटीआईआई (फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) में अभी एक्टिंग का कोर्स नहीं है, इसलिए वे एनएसडी आए है, क्योंकि उन्हें सिनेमा का एक्टर बनना है। सिनेमा का भी ऐसा एक्टर बनना है कि जिसकी एक्टिंग देखकर डायरेक्टर खुद पास आएं। ये उसका सपना था और जिंदगी में उसने अपने सामने इस मुकाम को हासिल भी किया।

नसीरूद्दीन शाह जैसा बनने की चाहत

जयपुर के दिनों में खुद को नसीरूद्दीन शाह जैसा अदाकार बनने की चाहत रखने वाले इरफान, तब बहुत खुश थे जब उनकी अदाकारी को नसीरूद्दीन शाह ने बहुत तारीफ की थी। कैमरे पर सहजता से एक्टिंग करने वाला एक बेहतरीन अदाकार जो कि सादगी की वजह से भीड़ से अलग था, आज मुश्किल दिनों में भी बेहद सादगी से ही मुम्बई के यारी रोड, वर्सोवा के कब्रिस्तान में बेदह शांति के साथ सुपुर्दे खाक कर दिया गया। वक्त से पहले चले गये निर्देशक गुरूदत्त के लिए कैफी आजमी ने जो चंद लाइनें लिखी थी, वह आज भी हमारे बीच में न रहने वाले महान कलाकार के लिए सटीक ही जान पड़ती हैं-

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

इरफान चले तो गये हैं लेकिन जिस तरह से सोशल मीडिया से लेकर हर जगह लोगों के बीच में उनकी उपस्थिति दिख रही है तो ऐसा लगता भी है कि दशकों तक इस सहज कलाकार को लोग अपने दिलों में बैठा कर रखेंगे और जब भी अदाकारी की बात होगी तो वह मोतीलाल, राजेन्द्र कुमार, राजकपूर, दिलीप कुमार, ओमपुरी, के साथ ही इरफान खान की एक्टिंग को जरूर से जरूर याद करते रहेंगे।

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