जिस चमगादड़ ने दुनिया में फैलाया कोरोना उनके जुड़े राज आए सामने, जानिए

कोरोना वायरस लेकर उड़ते चमगादड़ों की दुनिया ने इंसानों की दुनिया में एक नया ख़तरा ला दिया है। कोविड-19 वायरस से बेहाल सारी दुनिया ये जानकर हैरान और परेशान है कि कोरोना वाले चमगादड़ की चार बहनें क्या वायरस की मुसीबत को और बढ़ाएंगी? चार नई प्रजाति की जो मादा चमगादड़ मिली हैं, वो हॉर्सशू कहलाती हैं यानी घोड़े की नाल जैसी नाक वाले चमगादड़। कोरोना के दौर में आप चमगादड़ों के बारे में काफ़ी कुछ जान चुके होंगे, लेकिन हॉर्सशू चमगादड़ की प्रजाति अपने आप में थोड़ी अलग है। क़ुदरत ने इसे जो अजीबोग़रीब नाक दी है।

कोरोना वायरस पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों ने जो ख़बर दी है, वो उड़ते हुए वायरस से कम नहीं है। अगर रिसर्च पर यक़ीन करें तो कोविड-19 वायरस जिस चमगादड़ से फैलने की आशंका है, अब वो ख़तरा चार गुना बढ़ चुका है। कोरोना वायरस वाले चमगादड़ की चार बहनों का पता चला है। ये हॉर्सशू प्रजाति की मादा चमगादड़ हैं, जो रिश्ते में कोविड-19 वायरस वाले चमगादड़ की बहनें मानी जा रही हैं।

हॉर्सशू चमगादड़ की जिन 4 प्रजातियों का पता चला है, वो अफ्रीका से हैं। चमगादड़ों में कोरोना वायरस की पूरी फैमिली मौजूद होती है, लेकिन हॉर्सशू वाले चमगादड़ ज़्यादा ख़तरनाक माने जाते हैं। क्योंकि ये बाकी चमगादड़ से कुछ मायनों में अलग होते हैं। इनकी शक्ल सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली होती है। इनकी नाक के ठीक ऊपर की ओर कई तरह की झिल्लियां होती हैं। पहली नज़र में ऐसा लगता है कि ये इनके होंठ हैं, लेकिन इनके होठ इन झिल्लियों से काफ़ी नीचे होते हैं। नाक के ऊपर का ये हिस्सा हॉर्सशू यानी घोड़े की नाल की तरह दिखता है।

घोड़े की नाल जैसी नाक के ऊपर की ये स्किन हॉर्सशू चमगादड़ों का सबसे पहला हथियार है। आपको इनकी नाक के ऊपर पत्तियों जैसा ये डिज़ाइन भले ही अटपटा लगे, लेकिन ये इन्हें ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी है। अफ्रीका से मिली हॉर्सशू चमगादड़ की इन सिस्टर प्रजातियों को लीफ नोज़्ड़ (LEAF NOSED) चमगादड़ कहते हैं। इनकी नाक पत्तियों की तरह होती है। जेनेटिक एनालेसिस के जरिए इनकी पहचान की गई है। ये सभी एक म्यूजियम में थे, लेकिन इन्हें अफ्रीका से लाया गया था। ये एशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी पाए जाते हैं। ये अपनी विशेष नाक की वजह से बाकी चमगादड़ों से ज़्यादा कीट-पतंगों को खा सकते हैं और अपनी नाक में मौजूद स्किन की परतों को रडार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

यूं तो चमगादड़ एक रात में अपने वज़न के बराबर कीड़े या दूसरे जीव खा सकते हैं, लेकिन हॉर्सशू प्रजाति के चमगादड़ अपने वज़न से ज़्यादा कीड़े भी आसानी से खा लेते हैं। क्योंकि इनकी नाक के ऊपर मौजूद घोड़े की नाल जैसी स्किन कीड़ों को सुरक्षित घर जैसी लगती है। कीट-पतेंगे इसमें बैठते ही फंस जाते हैं। चमगादड़ इन झिल्लियों को बंद करके उसकी जान ले लेते हैं, फिर जीभ के ज़रिए उन्हें मुंह तक ले जाते हैं।

शिकागो के फील्ड म्यूज़ियम से मिली जानकारी के मुताबिक हॉर्सशू वाले चमगादड़ों पर कई देशों में रिसर्च चल रही है, क्योंकि इन्हें कोविड-19 यानी मौजूदा कोरोना वायरस फैलाने के लिए शक़ की निगाह से देखा जा रहा है। हालांकि वैज्ञानिकों का ये भी मानना है कि कोरोना वायरस वाले हॉर्सशू चमगादड़ की 4 मादा प्रजातियां रिसर्च में काफ़ी मददगार हो सकती हैं।

हॉर्सशू प्रजाति कोरोना रिसर्च में मददगार:

  • हॉर्सशू बैट की करीब 25-30 प्रजातियां होती हैं
  • नई प्रजातियां कोरोना के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं
  • हॉर्सशू प्रजाति भी पहले से खोजी गई प्रजाति है
  • इसलिए ये रिसर्च में मददगार साबित हो सकते हैं
  • चमगादड़ों में बहुत सारे वायरस होते हैं
  • लेकिन उनका मेटाबॉलिज्म काफ़ी तेज़ होता है
  • चमगादड़ों का DNA काफ़ी उन्नत किस्म का होता है
  • मेटाबॉलिज्म और DNA चमगादड़ों को संक्रमण से बचाता है

वैज्ञानिकों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का मानना है कि मौजूदा समय में चमगादड़ों को इंसानों से दूर रख पाना लगभग नामुमकिन हो चुका है। जंगल कटने की वजह से उन्हें गांवों में खेतों के आसपास शरण लेनी पड़ रही है तो वहीं शहरों में बने पार्क उनका नया ठिकाना हैं। जन्म से ही चमगादड़ अपने शरीर में वायरस लेकर उड़ते रहते हैं। इससे उन्हें तो कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन जब भी उनके वायरस का संक्रमण उनके ज़रिए किसी दूसरे जानवर में फैलता है तो वो किसी ना किसी रूप में इंसानों तक आसानी से पहुंच जाता है।

वैज्ञानिकों की रिसर्च के मुताबिक चमगादड़ की नई प्रजातियां और उनमें पाए जाने वाले वायरस की मदद से भविष्य की ऐसी ही आपदा से बचने में मदद मिलेगी, लेकिन मौजूदा कोविड-19 वायरस को लेकर अभी कुछ और प्रजातियों पर स्टडी जारी है। चमगादड़ अपने आप में वायरस की पोटली लेकर मीलों का सफ़र करते हैं और दुनियाभर में इनकी करीब डेढ़ हज़ार प्रजातियां उड़ रही हैं। इसलिए इसमें कोई शक़ नहीं कि ख़तरा इंसानों के बहुत क़रीब है, तभी तो विज्ञान और वायरस के बीच संघर्ष जारी है।

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