शिव-सती संवाद : बड़े भावुक हैं महादेव , चाहे प्रेम हो या अध्यात्म

भगवान शिव तो वैरागी हैं, न उन्हें सम्मान का मोह है, न अपमान का भय । पर वैरागी से यह मतलब नहीं कि उन्हें किसी चीज से कोई मतलब नहीं रहता । वे सांसारिक मोह माया से दूर रहकर भी अपने दाम्पत्य जीवन को बखूबी निभाते हैं । विवाह के नियमों का पालन करते हुए खुद को माया से दूर रखने वाले हैं हमारे महादेव ।

यह सब उनके वैराग्य का ही एक रूप है । भोलेनाथ भावुक प्रेमी के साथ भयंकर रूप से क्रोधित होनेवाले हैं । इस तरह के उनके कई रूप हैं । लेकिन भावुक प्रेमी वाला रूप सबसे सुंदर है । दरअसल यह रूप वो अपनी प्रिय पत्नी सती के सामने रखते हैं – वो रूप है प्रेम का । लेकिन प्रेम के इस रूप में भी शिव आध्यात्म का संपूर्ण ज्ञान बांट देते हैं ।

शिव और सती के बीच हुए छोटे से संवाद को…

सती-शिव का यहां ऐसा संवाद है, जिसमें उन्होंने प्यार के माध्यम से संसार की शक्ति, संसार में एकरूपता की बात की है । अपनी प्रिय सती को वो मोक्ष और प्रेम, दोनों की परिभाषा समझाने की कोशिश कर रहे हैं ।

सती और शिव की प्रेम लीलाओं में बहुत कुछ छुपा हुआ था । एक दिन सती शिव से बोलीं, “कुछ अच्छा कहो” । इस पर शिव हंस दिए और कहा, “तुम बहुत अच्छी हो” । फिर सती ने उनसे कहा “कुछ अच्छा कहिए, कुछ अर्थपूर्ण” ।

शिव : जीवन का यूं तो कोई अंत नहीं होता, पर तुम्हारे प्रेम के बिना तो जीवन ही नहीं है ।
सती : मतलब?
शिव : मतलब…हम अनंत हैं, पर अधूरे हैं । अगर इस अनंतता को बांटने के लिए कोई साथ न हो, तो हम अधूरे ही रहेंगे ।
सती : मुझे जीवन के बारे में और बताइए ।
शिव : जीवन की यात्रा में खुद को जान लेना ही सबसे बड़ा रोमांच है ।
सती : क्यों?

शिव : एक दिन खुद को जानने के सफ़र में पता चलता है कि अंत और आरम्भ एक ही है ।
सती : क्या आपको ये सब ध्यान करते हुए और योग करते हुए ज्ञात हुआ?
शिव : योग शरीर के लिए नहीं होता, योग आत्मा को खोजने में मदद करता है ।
सती : सुन्दर!

शिव : अपने अन्दर की ज्योति को पहचान कर ही असली शान्ति पायी जा सकती है ।
सती : ज्योति?
शिव : आत्मा की ज्योति. ब्रह्माण्ड को, जीवन के उद्देश्य को जानना ही अपने अन्दर की ज्योति को पहचानना है ।
सती : मुझे शिवलिंग से प्रेम था और अब उस शिवलिंग में बसे आपके रूप से प्रेम है ।

शिव : तुम भानमती हो, तुम्हारा होना मुझे सम्पूर्ण करता है ।
सती : मैं भानुमति हूं, तो आप क्या हैं, जो सारे संसार को सम्मोहित कर रखा है?
शिव : मैं योगी हूं, तत्व में डूबा , प्यार के सार में डूबा योगी ।
सती : तो आप खुद को ब्रह्मचारी क्यों कहते हैं?
शिव : ब्रह्मचर्य तो ईश्वर में खो जाना है ।
सती : पर मुझे आपके लिए अपना प्रेम अध्यात्म से बड़ा क्यों लगता है?

शिव : प्रेम का आकर्षण ऐसा ही होता है । ये संसार को काबू में कर सकता है । प्यार और अध्यात्म एक साथ चलते हैं ।
सती : जब आप चुप होते हैं, तब भी ऐसा लगता है जैसे मुझसे बातें कर रहे हैं ।
शिव : ये चुप्पी बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं । शांत होना स्थिरता प्रदान करता है ।
सती : कहिए कि आप मुझसे प्यार करते हैं ।

शिव : हां मैं तुमसे प्यार करता हूं, पर तुम्हारा जादू कुछ ऐसा है कि मैं कह नहीं पाता । तुमसे मिलने से पहले मेरी कोई इच्छाएं नहीं थीं । तुमने इस योगी को बिगाड़ दिया है ।
सती : बिगाड़ दिया है? मैं समझी कि आप योग में डूब गए हैं, मेरे लिए समय ही कहां होता है आपके पास? कभी-कभी आपको समझना नामुमकिन लगता है।
शिव : ऐसा सिर्फ़ तब होता है, जब मैं ध्यान में मग्न होता हूं । पर जब तुम्हें देखता हूं, तो लगता है कि और कुछ नहीं चाहिए ।

शिव के द्वारा दिया गया ज्ञान असीम है, अनंत है । उनकी बातें गहरी और उनकी चुप्पी उससे भी गहरी थी । उनकी हंसी-ठहाके में भी ज्ञान छुपा होता था ।

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